संत गरीब दास जी महाराज की वाणी

गरीब,
 पतिब्रता चूके नहीं, धर अंबर धसकंत।
संत न छांड़े संतता, कोटिक मिलैं असंत।।
भावार्थ चाहे धर धरती तथा अम्बर आकाश धसके यानि नष्ट हो जाऐं इतनी
आपत्ति में भी दृढ़ भक्त पतिव्रता आत्मा डगमग नहीं होता। इसी प्रकार संत सत्य भाव
से भगवान पर समर्पित साधक अपनी सन्तता साधु वाला स्वभाव नहीं छोड़ता चाहे
उसको करोड़ों असन्त नास्तिक व्यक्ति या अन्य देवों के उपासक मिलो और वे कहें कि
आप गलत ईष्ट की पूजा कर रहे हो या कहें कि क्या रखा है भक्ति में ? आदि-आदि विचार
अभक्तो असन्तों के सुनकर भक्त अपनी साधुता नहीं छोड़ता।

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